Friday, February 16, 2007

गाँव

यूक्लिप्टस की जगह नीम की छाँव हो
सोच रहा हूँ स्वयं शहर में गाँव हो।

जैसे पानी घुस जाता है गाँव में
शहर जबरिया घुस जाता है गाँव में।
पंचतत्व बिक गए भैंस है पानी में,
सज्जनता जीवित है कथा-कहानी में
नहीं काँइए कौवे जी की काँव हो
सोच रहा हूँ स्वयं शहर में गाँव हो।

शहर बदल देता है नक्शा गाँव का
धूमधड़ाका है ाकुनी के दाँव का
ऊँची ऊँची दीवारों का बड़ा शहर
बहुत दिखावा मगरमच्छ ढा रहा कहर
लंका में निश्छल अंगद का पाँव हो
सोच रहा हूँ स्वयं शहर में गाँव हो।

साँसें लेना बहुत कठिन है धुआँ घुसा
बिना बुलाए अतिथि शोर बस गया ठुसा
बैलों की घंटियाँ बजें ट्रैक्टर छोड़ें
कम्प्यूटर को सोच समझ कर ही जोड़ें
सबका सुख दुख एक बने वह ठाँव हो
सोच रहा हूँ स्वयं शहर में गाँव हो।
***
-डॉ० राष्ट्रबंधु

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